विवादित कुलसचिव की ताजपोशी की तैयारी

देहरादूनः एक ओर भारत के ईमानदार प्रधानमंत्री देशभर से भ्रटाचार को जड़े से उखाडने का संकल्प लिये हुए हैं तो दूसरी और प्रदेश की डबल इंजन सरकार भी जीरो टाॅलरेंस की नीति से राज्य को भ्रष्टाचार मुक्त करना चाहती है। लेकिन चाटुकारों द्वारा प्रदेश के मुखिया की ईमानदार छवि को धूमिल करने के प्रयास लगातार किये जा रहे हैं। बात चाहे उत्तरा प्रकरण की हो या फिर कुलसचिव मृत्यंजय मिश्रा की। एक बार फिर राज्य के एक बड़े विश्वविद्यालय में ऐसे व्यक्ति को दोबारा कुलसचिव पर प्रतिनियुक्ति का विस्तार किये जाने की तैयारी है, जिसकी छवि एक विवादित व्यक्ति की रही है। जबकि उक्त व्यक्ति कुलसचिव पद के लिए पूरी तरह पात्र भी नहीं है। इसके बावजूद मुख्यमंत्री को नियमों की गलत जानकारी देकर विश्वविद्यालय अधिनियम व परिनियमों के साथ-साथ केंद्रीयकृत प्रशासनिक नियमावली का भी उल्लंघन किये जाने की पूरी तैयारी मुख्यमंत्री स्टाॅफ द्वारा की जा चुकी है। सुनने में यह भी आ रहा है कि सचिवालय तथा उच्च शिक्षा मंत्रालय के कुछ तथाकथित लोगों द्वारा स्वयं विवादित कुलसचिव की फाइलें निर्धारित माध्यमों को दरकिनार करके स्वयं ही दौड़ा रहे हैं। जबकि शासन की फाइलें अतिगोपनीय होती है। ऐसे में तथाकथित लोगों द्वारा कुलसचिव की फाइलें कैसे इधर-उधर की जा रही हैं, यह विचारणीय विषय है। इससे मुख्यमंत्री के उस आदेश का भी खुलेआम उल्लंघन हो रहा है जो कि उन्होंने शासन की गोपनियता को लेकर कुछ समय पहले दिये थे। यह भी सुनने में आया है कि कुलसचिव स्वयं फाइलों के पीछे-पीछे सचिवालय तथा मंत्रालय में दौड़ा रहा हैं तथा अधिकारियों पर टीपे बदलवाने का भी दबाव डाल रहा हैं।
बिना विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय के कुलपति की संस्तुति के ही संबंधित कुलसचिव की पत्रावली को बढ़ाया गया है। जबकि विश्वविद्यालय में संपर्क करने पर जानकारी उपलब्ध कराई गई कि कुलसचिव की प्रतिनियुक्ति विस्तार किये जाने के संबंध में कुलपति द्वारा 07 जून 2019 को प्रमुख सचिव उच्च शिक्षा को पत्र प्रेषित किया गया है। परन्तु शासन द्वारा कुलपति और विश्वविद्यालय के पत्र पहुंचने से पहले ही कुलसचिव की पत्रावली को उच्च शिक्षा मंत्रालय तक पहुंचाया गया है।
राज्य की विधानसभा में पारित उत्तरांचल शासन की अधिसूचना संख्या 647/ग्ग्प्ट(6)/2005-3(112)2002 दिनांक 28 जून 2006 की केंद्रीकृत प्रशासनिक नियमावली की धारा 20(5) में स्पष्ट उल्लेखित है कि राज्य विश्वविद्यालयों में प्रतिनियुक्ति पर तैनात कुलसचिवों/ उप कुलसचिवों/ सहायक कुलसचिवों का सेवा विस्तार राज्य लोक सेवा आयोग की संस्तुति के बिना किसी भी दशा में नहीं बढ़ाया जा सकता है। परन्तु देखना यह होगा कि जीरो टाॅलरेंस वाली सरकार इस नियम का किस तरह से पालन करती है।
कुलसचिव की एक वर्षीय प्रतिनियुक्ति में ही बड़ा गड़बड़झाला किया गया तथा अशासकीय महाविद्यालय में तैनात एक सहायक प्रोफेसर को कुलसचिव पद पर नियम विरूद्ध नियुक्ति दी गई। जबकि शासन में कार्मिक विभाग द्वारा स्पष्ट रूप से टिप्पणी की गई है कि अशासकीय महाविद्यालय में तैनात किसी भी व्यक्ति को विश्वविद्यालय तथा किसी अन्य सरकारी संस्थान में प्रतिनियुक्ति दिया जाना कदापि न्यायोचित नही है एवं कुलसचिव पद के लिए 15 वर्षों का प्रशासनिक अनुभव भी अति आवश्यक है। बावजूद इसके अपात्र व्यक्ति को कुलसचिव जैसे महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी सौंपी गई।
एक वर्षीय कार्यकाल के दौरान कुलसचिव पर अवैध वसूली, संस्थानों में कार्यरत महिला अध्यापिकाओं के साथ अभद्रता, कुलपति के आदेशों की अवहेलना, शासकीय वाहन का दुरपयोग तथा सरकार के मुखिया सहित अन्य बड़ी हस्तियों के साथ फोटो व्हट्अप की डिस्प्ले प्रोफाइल पर लगाकर रौब दिखाने के कई आरोप लगे हैं। जिनकी पुष्टि विश्वविद्यालय द्वारा की गई है।
काॅलेजों में अध्यापिकाओं के साथ अभद्रता के प्रकरण पर राजभवन द्वारा कड़ी नाराजगी दर्ज करने बाद शासन द्वारा संज्ञान लेकर संबंधित अध्यापिकाओं से शपथ पत्र मांगे गये। अध्यापिकाओं द्वारा शपथ पत्र देने के बाद शासन स्तर पर कुलसचिव के खिलाफ जांच विचाराधीन है। लेकिन इसके बावजूद भी कुलसचिव की दोबारा ताजपोशी की तैयारी लभगभ अंतिम चरण में है।
वहीं दूसरी ओर सामाजिक संगठनों तथा उच्च शिक्षा से जुड़े शिक्षाविदों का कहना है कि नियम विरूद्ध नियुक्यिों का अधिकार न तो शासन को है और न ही सरकार को। इनका कहना है कि अगर नियम विरूद्ध नियुक्ति की जाती है तो ऐसे में उच्च शिक्षा से जुड़े समाजिक संगठनों के पास माननीय न्यायालय का दरवाजा खुला है। वहीं नियम विरूद्ध नियुक्तियों/ प्रतिनियुक्तियों पर विश्वविद्यालय व राजभवन अडंगा लगा सकता है।
सरकार और शासन द्वारा अगर विश्वविद्यालय में किसी भी प्रकार की प्रतिनियुक्ति नियम विरूद्ध दी जाती है तो इसके खिलाफ उच्च शिक्षा से जुड़े संगठनों, छात्र संगठनों और जन प्रतिनिधियों द्वारा इसकी शिकायत सीधे केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय से की जाने की संभावनाएं भी जताई जा रही हैं। जिससे सरकार को आ बैल मुझे मार की स्थिति उत्पन्न होने की पूरी संभावना है।

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