मालू (लता काचनार) थार्माकॉल का विकल्प, औषधीय गुणों से है भरपूर

मालू (लता काचनार) के पत्ते थर्माकॉल का सशक्त विकल्प हो सकता है। उत्तराखंड में पारंपरिक रूप से शादी-ब्याह में मालू के पत्तों का उपयोग होता रहा है। वैज्ञानिकों व चिकित्सकों का कहना है कि पर्यावरण व स्वास्थ्य के लिहाज से जहां थर्माकॉल हानिकारक है, वहीं मालू के पत्ते, फूल व छाल औषधीय गुणों से भरपूर हैं। मालू को हिंदी में लता काचनार कहा जाता है। मालू का (वैज्ञानिक नाम बाहुनिया वाहली) है। यह उत्तराखंड के साथ ही पंजाब, मध्यप्रदेश, सिक्किम, उत्तर प्रदेश में पाया जाता है। मालू सदाबहार पौधा है। इसके पत्तों से पत्तल, पूड़े व पूजा की सामग्री बनाई जाती है। साथ ही चारा पत्ती के रूप में भी उपयोग की जाती है। मालू का फूल भौंरों के शहद बनाने में सहायक होने के साथ ही औषधीय उपयोग में भी लाया जाता है। छाल से चटाई व सूखी लकड़ी ईंधन के रूप में काम आती है। छप्पर की छत बनाने में भी पत्तों का उपयोग किया जाता है। मालू के पौधे जल स्रोत व मृदा संरक्षण का काम करता है। मालू के पौधा पारिस्थितिकीय संतुलन के साथ ही जल स्रोत व मृदा संरक्षण में अहम होता है। मालू के पत्तों के काढ़े से शरीर में बन रही गांठों की बीमारी दूर होती है। खांसी, जुकाम व पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने के लिए भी मालू के पत्तों का उपयोग किया जाता है। मालू उपयोग के बाद भी लाभकारी होता है। शादी-ब्याह में पत्तल, पूडों के उपयोग के बाद इनसे खाद बनाई जाती है। जबकि थर्माकॉल को नष्ट नहीं किया जा सकता है। मालू का पौधा जल तथा मृदा संरक्षण के लिए लाभकारी बताया जाता है। मालू हर प्रकार से उपयोगी है। मालू की सूखी लकड़ी ईंधन के काम आती है, इसकी छाल से चटाई आदि बनायी जाती है। इन पत्तलों में खाना खाने का एक अलग ही आनंद हुआ करता था। कई जगहों पर तो किसी शादी ब्याह से पहले से पत्तल दौनो का निर्माण कार्य शुरु हो जाता था। जहां हम लोग इसके महत्व को भूलते जा रहे है वही दूसरी ओर पश्चिमी देशों में लोग स्वास्थ्य को लेकर जागरूक हो रहे हैं और वो लोग इसका प्रयोग पत्तल आदि के रूप में कर रहे हैं। जर्मनी में इससे बनी पत्तल को नेचुरल लीफ प्लेट के नाम से जाना जाता है और युवाओं में खूब रुचि देखने को मिल रही है। जहां हमने अपने इस पारम्परिक व्यवसाय को खत्म कर दिया वहीं जर्मनी में इसे लेकर एक बड़े व्यवसाय ने जन्म ले लिया है। वहा इससे निर्मित पत्तलों आदि का प्रयोग होटलों में भी किया जा रहा है। यह एक फैशन बन चुका है। यूरोप में बहुत से बड़े होटलों में इन पत्तलों का भारी मात्रा में आयात भी किया जाता है। उत्तराखण्ड में मालू की टांटी को आग में पकाकर खाया जाता है। मालू उत्तराखण्ड के अलावा पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, सिक्किम आदि में भी उपलब्ध होता है। मालू के पत्तो में एन्टीबैक्टीरियल गुण मौजूद होते हैं। यदि पुराने समय की बात करे तो इसका प्रयोग बुखार, अतिसार व टॉनिक के रूप में उपयोग में लाया जाता था। इसमें लिपिड 23.26, प्रोटीन 24.59 और फाइबर 6.21 प्रतिशत तक होते हं।
Category: उत्तराखण्ड

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