जल संचय पर ‘उत्तरायणी’ द्वारा आयोजित संगोष्ठी सम्पन्न

नई दिल्ली : जनसरोकारों के उत्थान हेतु प्रतिबद्ध उत्तराखंड के प्रवासी सेवानिवर्त अधिकारियों की सु-विख्यात सामाजिक संस्था ‘उत्तरायणी’ द्वारा 1 अक्टूबर को इंडिया इंटरनैशनल सेंटर (आईआईसी) मे आयोजित उत्तराखंड के जल संचय से जुड़े विषय पर आयोजित संगोष्ठी सम्पन्न हुई।

संस्था से जुड़े आलोक रावत, पुष्कर सिंह धामी, पद्मश्री डॉ अनिल प्रकाश जोशी, ए डी शर्मा, के एन पांडे, ललित छिमवाल, लोकेश गैरोला, चन्दन डांगी, के सी पांडे तथा संस्था अध्यक्ष कर्नल डॉ विपिन पांडे इत्यादि द्वारा दीप प्रज्वलन की रश्म पूरी करने के सायः ही संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। जल से जुड़े विभिन्न विषयों, जल संचय और उसके संवर्धन पर चुनोंती व समस्याऐ। जल स्रोत से जुडी सरकारी नीतियां एवं प्रबंधन। नदी व वर्षा जल का महत्व। जल संचय प्रबंधन से जुडी चुनोती और हल तथा जल संचयन, संवर्धन व संरक्षण पर मार्ग दर्शन, ज्ञानवर्धक विषयो पर आयोजित संगोष्ठी से पूर्व मंच संचालिका मीना कंडवाल तथा उत्तरायणी संस्था अध्यक्ष कर्नल (डॉ) विपिन पांडे द्वारा आयोजित सेमिनार के महत्व व उत्तरायणी संस्था की कार्य योजनाओं पर बृहद प्रकाश डाला गया। अवगत कराया, वर्तमान मे जल विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषय से सम्बद्ध उनकी संस्था द्वारा आयोजित यह पहली संगोष्ठी यूडीआरएफ के सहयोग से आयोजित की जा रही है।

पांच स्त्रो तक आयोजित संगोष्ठी को प्रख्यात पर्यावरण विद पद्मश्री डॉ अनिल प्रकाश जोशी, पूर्व वाटर रिसोर्स सचिव भारत सरकार आलोक रावत, यूडीआरएफ अध्यक्ष गिरिजा शंकर जोशी, पूर्व निदेशक उत्तराखंड ओपन यूनिवर्सिटी डॉ दुर्गेश पंत, विभागाध्यक्ष इनर्जी एवं वाटर भारत सरकार डॉ संजय बाजपेयी, सलाहकार नीति आयोग उत्तराखंड सरकार एच पी उनियाल, फाउंडर फील गुड सुधीर सुन्दरियाल, पूर्व एमडी उत्तराखंड फोरिस्ट कोर्पोरेशन एसटीएस लेप्चा, संस्थापक जल, जमीन, जंगल-जीवन जगत ‘जंगली’ सिंह चौधरी, नोंला फाउंडेशन बिशन सिंह बंशी, टाटा ट्रस्ट विज्ञानी डॉ सुनीश शर्मा, मैती आंदोलन संस्थापक कल्याण सिंह रावत, मैम्बर एक्सपर्ट वाटर रिसोर्स भारत सरकार डॉ भाष्कर पाटनी, जल विज्ञानी डॉ एम सी तिवारी, सेवानिवर्त आईएएस डॉ कमल टावरी तथा अध्यक्ष इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिटिएटिव सुशील रमोला द्वारा उत्तराखंड राज्य के जल संचय, संरक्षण व संवर्धन की चुनोती पर आठ घन्टे तक चली संगोष्ठी मे सारगर्भित ज्ञानवर्धक व तथ्यपरख विचार व्यक्त किए गए। प्रबुद्ध श्रोताओं द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब वक्ताओ द्वारा दिए गए।

उत्तराखंड व दिल्ली मे प्रवासरत पर्यावरण, जल विज्ञान, नीति आयोग, वाटर रिसोर्स व धरातल पर कार्यरत प्रबुद्ध वक्ताओ द्वारा पेयजल योजनाओं के स्रोत संवर्धन, नदी व वर्षा जल संचयन इत्यादि पर महत्वपूर्ण वक्तव्य तथा सुझाव रखे।
अनुभवी वक्ताओ ने व्यक्त किया, पानी अर्थव्यवस्था का मूल आधार है। हमे पानी की प्रत्येक बूद पर सोचना होगा। हम कैसे पानी के महत्व को जाने, कैसे लोगो को महत्व समझाए। कहा, यह संगोष्ठी एकेडमिक नही, पानी के महत्व को समझने के लिए है। कैसे इसका बेहतर इस्तेमाल किया जाय। संवर्धन व संरक्षण किया जाए।

वक्ताओ ने कहा, जल संकट ने विश्व को अपनी चपेट मे ले लिया है। जनजागरण कर इससे निपटना होगा। उत्तराखंड भी जल संकट से गुजर रहा है। ‘उत्तरायणी’ की सोच इस पर गई है। वर्तमान मे उत्तराखंड के 16973 गांवो मे से 594 गांव पेयजल हेतु प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर हैं। प्रदेश मे दो लाख छः हजार प्राकृतिक जल स्रोत हैं, जिनमें बारह हजार सूख गए हैं।

पानी के मुद्दे पर उत्तराखंड बड़ा इश्यू है। विकास के क्रम मे पानी की क्वालिटी घट रही है। जल अशुद्धियां बढ़ रही हैं। यह सब तकनीकी जांच से पता चलता है। जल इस्तेमाल हेतु नही है तो उसका शुद्धिकरण करना होगा। नेचुरल वाटर ट्रीटमेंट पर कार्य कर खर्चा कम आता है। वर्षभर उत्तराखंड मे छः लाख पेड कट रहे हैं। धरातल पर पेड़ रुपाई कम, कागजो मे ज्यादा हो रही है। हालात बिगड़ रहे हैं। तराई के अधिकतर ब्लाक अंडर ग्राउंड वाटर से प्रभावित हो रहे हैं। फ्लोराइड व नाइट्रेट बढ़ रहा है। जिससे घातक बीमारिया बढ़ रही हैं। पहाड़ों में टेंकर से पानी पहुच रहा है। श्रोत सुख रहे हैं। पानी नही होगा तो स्वछ भारत का क्या होगा?

वक्ताओ ने कहा, पुरानी सभ्यताऐं पानी के आधार पर ही थी। तकनीक से हट कर कुछ संस्थाए पारम्परिक तौर तरीके पर काम कर रही हैं।चैक डैम बना कर जल संचय का प्रयोग किया जा रहा है। हिमालय ग्राम विकास समिति गंगोलीहाट जल संचय पर प्रयोगरत है। टाटा ने गधेरों के रिभाईव पर पायलट प्रोजेक्ट के तहत इर्द-गिर्द पेड लगा कर नब्बे प्रतिशत सफलता हासिल की जल संवर्धन पर। हंस फाउंडेशन ने टायलेट बनाऐ , पानी दिया। व्यक्तिगत तरीके से चौड़ी पत्ते के पेड़ लगा, उनकी सुरक्षा कर, जल संवर्धन मे योगदान दिया जा सकता है, जल समस्या की किल्लत को दूर करने के लिए।

व्यक्त किया गया, नीति आयोग ने उत्तराखंड के जल संचय से सम्बद्ध प्रयोगों को नही लिया है, जो दुर्भाग्य है। उत्तराखंड के परिपेक्ष्य वाटर रिसोर्स कहलाता है। इलाका बाधो से पटा पड़ा है, लोगो को पानी नही है। हम बाढ़ की बाट जोहते हैं या फिर सूखे की। जल संचय व संकट पर नए सिरे से सोचने की जरुरत है। एक सूत्री कार्यक्रम रह गया है जीडीपी कैसे बढ़े? पानी जीडीपी मे कही नही है। पानी की बोतले व्यापार हो गया है, जो जीडीपी मे है। उत्तराखंड मे 5 करोड़ बोतले बिकती हैं। उत्तराखंड पानी के व्यापार के बारे नही सोच पाया है। प्राण वायु गई, मिट्टी गई, पानी गया, जो जीडीपी मे नही आता। कैमिकल इंडस्ट्री जीडीपी मे है।

कहा गया, प्रकृति के विज्ञान को आजतक नही समझा गया, जिसे समझना जरूरी है। हमे जीईपी चाहिए! कितना जंगल बढ़ाया, पानी बढ़ाया, प्रदूषण घटाया, हमे सरकार से यह पूछना होगा, जो जीडीपी को महत्ता दे रही है।

विलासिता विकास नही है। पानी जब तक विकास का मुद्दा नही बनेगा, तब तक सब व्यर्थ है। पहाड़ व हिमालय पर नई चिंता करनी होगी। हिमालय के लोगो को जोड़ कर प्रयोग करने होंगे। प्रकृति के रास्तों को वापस लाना होगा। जल दोहन से पूर्व उसका संरक्षण करना होगा। दुर्भाग्य! जल गामी रास्ते खत्म हो गए हैं। नदिया सुख गई हैं। जलागम श्रोत बनाने होंगे। जब धारे सुख रहे थे, किसी ने नही सोचा। पहले जहा धारे थे लोग बसते थे। आज जहां बस रहे हैं, पानी ले जाया जा रहा है। धारे ही पानी का मुख्य स्रोत हो सकते हैं। यही स्थायित्व देंगे। अप्राकृतिक तौर तरीके नही ठहर सकते। विकल्प तलाश हमने सबको मार दिया, पारम्परिक विधियों को नकार कर।

वक्ताओ ने व्यक्त किया, पानी का सीधा संबंध जैव विविधता से है, चालखाल से नही। चालखाल कंसेप्ट तराई का है। पानी के साथ कोई विज्ञान नही है। पेड़ो की विविधता जल स्रोत हैं। चीड़ लगाओ, चीड़ हटाओ ठीक नही। विविधता जरूरी है। जैव विविधता से पानी के स्रोत विकसित होते हैं।वक्ताओ ने कहा, देवभूमि के पास रिसोरशेस हैं, शुद्ध हवा है, जैविक खानपान है, शुद्ध ईमानदारी है। नही है तो बस सरकार की वाटर पोलिशी।

हम सबको जनसरोकारों के हित हेतु, दायित्व समझ कार्य करने होंगे। उत्तराखंड मे 65 प्रतिशत जंगल, 3550 कि.मी. ग्लेशियर हैं। दुर्भाग्य 85 प्रतिशत इलाका सिंचित नही है। पहाड़ के लोगो का जीवन पानी पर निर्भर है, जो जीवन से जुड़ा है। पानी के स्रोत 50 प्रतिशत घट गए हैं। 29904 बस्तिया हैं। 41 प्रतिशत बस्तियों मे मानक अनुसार पानी नही मिल रहा है। 30 प्रतिशत पानी मिल रहा है। उत्तराखंड मे 12 लाख वाटर कनैक्शन जुड़ने हैं। वर्तमान मे 3 लाख कनैक्शन हैं। कनैक्शन पूर्ण करने हेतु 6600 करोड़ रुपये की जरूरत हैं। वर्ष 2024 तक 3500 करोड ही खर्च हो पायेंगे।

वक्ताओ ने कहा, ‘जल ही जीवन है, जल है तो कल है’।निजात पाने के लिए हमे क्या करना है समझना होगा। जो हम करना चाहते हैं वह सरकार ही नही, सभी स्थानीय लोगों व हम सबका दायित्व बनता है। गांव वालों की मुख्य भूमिका होनी चाहिए, जन चेतना जगा कर। योजना स्थाई होनी चाहिए। चालखाल, आद्र भूमि या वैटलैंड प्राकृतिक जल स्रोतों के रिचार्ज जोन, जल संग्रहण क्षेत्र आदि के संरक्षण पर ध्यान देना होगा। विविध प्रकार के पेड़, झाड, घास लगा, गाड़-गधेरों व जंगलों का विस्तार करना होगा। इस हेतु जन सहभागिता द्वारा बंजर खेतो को आबाद कर, जुताई कर, पेड लगा, वनाग्नि पर अंकुश लगा, बच्चो को जल संवर्धन मे भागीदार बना, दायित्व निर्वाह करना होगा। पानी बचाने के लिए भावनात्मक रूप से जुड़ना होगा। समर्पण करना होगा।पानी संस्कृति से जड़ा हुआ है। आजीविका से जुड़ा हुआ है। पहाड़ के पानी व जवानी के पलायन को थामना होगा। धरातल पर उतर काम करना होगा।

वक्ताओ ने कहा, पानी से जुड़ा यह विषय उत्तराखंड का ही नही देश दुनिया से जुड़ा विषय है। प्रत्येक पहलू पर सोचना जरूरी है। तापमान बढ़ रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। पालिसी ऊपर से नीचे तक बनानी होंगी। समाज के प्रत्येक वर्ग को साथ मिल कर काम करना होगा। पानी की बचत करनी होगी। नदियों के बहाव व ग्राउंड वाटर के स्तर पर ध्यान देना होगा।

वक्ताओ ने अपने अनुभव सांझा कर अवगत कराया, सुरंगे बना भारी मात्रा मे पानी की प्राप्ति की जा सकती है।मलेथा की कूल इसका उदाहरण है। बाध बनाने से पूर्व ग्राउंड वाटर लेबल मापा जाता है। इस हेतु सर्वे जरूरी है। भूस्खलन से वाटर मैनेजमैन्ट का हिसाब बिगड़ रहा है। भूस्खलन का कारण लैंड वाटर होता है। सुरंगों से आज उत्तराखंड को बचाने की जरुरत है।

उत्तरायणी उपाध्यक्ष जी डी गौड द्वारा सभी वक्ताओ, संस्था सदस्यों व अन्य गणमान्य अतिथियो को धन्यवाद प्रस्ताव के साथ ही जल संचय से जुडी संगोष्ठी का समापन हुआ।

Category: राष्ट्रीय

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