सरकारों के मुँह पर तमाचा मारती 14 वर्षीय मुकेश कैंतुरा की गरीबी-बेबसी

By | March 6, 2019

-कुलदीप राणा आजाद/रूद्रप्रयाग

जरा समझिए कि हमारा सिस्टम किस ओर जा रहा है। इस लोकतांत्रिक देश में हमारे नेता, अधिकारी, नीति निर्धारक जिस व्यवस्था के लिए तैनात किए गए हैं क्या वो अपना कार्य ठीक से कर रहे हैं। क्या वाकई में हम गुलामी की बेड़ियों से आजाद हो गए हैं। क्या वाकई में सरकार में बैठे नेताओं के वादे-दावे धरातल पर सच होते दिख हैं। अंतिम छोर के व्यक्ति तक विकास और सुविधाओं की गंगा भाषणों से क्या जमीन पर उतर पा रही है? इन सब सवालों के जवाब 18 वर्ष के इस जवान राज्य में आज आपको एक ऐसे गरीब-बेबस परिवार की दुःख भरी कहानी से मिल जायेंगे, जिसे देखकर न केवल आपकी आँखे भरेंगी बल्कि उन कुर्ताधारियों को भी आप जमकर कोसेंगे जो पांच साल में एक बार आपकी चरण वंदना करने तो आते हैं मगर जीतने के बाद कभी दर्शन ही नहीं देते।

कहते हैं जीवन में सबसे बड़ा अभिशाप ‘गरीबी’ होती है और अगर इस गरीबी के बीच दुःख बीमारी लग जाय तो यकीनन इन्सान की जिंदगी जीते जी मौत जैसी हो जाती है। लेकिन अपने देश से गरीबी, विषमता भुखमरी खत्म करने वाली सरकारों को आज ऐसी हकीकत दिखाएंगे जिसे देखकर 70 साल की आजादी और 18 वर्ष के उत्तराखण्ड राज्य के विकास की सारी गाथाएं धुमिल नजर आएंगी। जी हाँ उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के मूल में पहाड़ों की स्वास्थ्य व्यवस्था, बुनियादी सुविधा और गरीबी को खत्म करने का सवाल भी बड़ी प्रमुखता से उठाया गया था। लेकिन राज्य मिलने के बाद यह सब हो पाया है? इसका अंदाजा इस तस्वीर लगाया जा सकता है। 18 वर्ष बीत जाने के बाद भी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली ने न जाने कितने ही जीवन लील लिए हैं और कितनी ही जिन्दगियों को इलाज के अभाव में अपाहिज बना के रख दिया है।

बिस्तर में पड़े जिस शक्स को आप देख रहे हैं यह है 14 वर्षीय मुकेश सिंह कैंतुरा। भले ही इसकी यह हालत दुर्घटना में हुई हो लेकिन हमारे रसूकदार सिस्टम ने इसके दर्द को 6 साल की लम्बी अवधि तक जिंदा रखने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। अगस्त 2013 में विकास खण्ड जखोली के महरगांव के शिशुपाल सिंह कैंतुरा की तीन संतानों में सबसे छोटे लड़के पांचवी में पढ़ने वाले मुकेश सिंह सड़क किनारे भूधसांव हो रही दीवाल की चपेट में आ गया था। इस हादसे में उसे गम्भीर चोंटे आई। ध्याड़ी-मजदूरी करके किसी तरह अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे शिशुपाल सिंह कैतुरा पर इस दुघर्टना ने मानों दुःखों का ऐसा पहाड़ गिरा दिया कि शिशुपाल सिंह इस दर्द से आज तक नहीं उभर पाये। अपने पास जितने पैंसे थे बेटे के इलाज में वो तो खर्च किए ही बल्कि कर्ज के बोझ तले भी दब चुके हैं मगर बेटे की हालत में सुधार नहीं आई।

दुर्घटना में बुरी तरह जख्मी हुए मुकेश का तीन माह जौली ग्रांट देहरादून में इलाज हुआ लेकिन मुकेश के सिर में इतनी गहरी चोटें आई थी कि उसके इलाज के लिए लाखों का खर्चा आ रहा था जिसे मुकेश का गरीब पिता वहन नहीं कर पा रहे थे। स्थानीय विधायकों से लेकर एसडीएम जखोली और ब्लाॅक स्तर में अपने लड़के के इलाज के लिए सहायता की गुहार लगाई लेकिन इस बेरहम सिस्टम ने पिछले 6 साल से इस गरीब परिवार की सुध नहीं ली। स्थिति यह है कि पिछले छः सालों से मुकेश बिस्तर में मृत समान पड़ा हुआ है। खाना पीना, लेटिन बाथरूम सब बिस्तर में ही होता है। इस परिवार पर गरीबी जैसे अभिशाप तो था ही, ऊपर से मुकेश की इस हालत ने इस परिवार को जीवन भर के लिए दर्द की भट्टी में झोंक दिया है।

गरीबी ही सही पर हँसते खेलते इस परिवार की खुशियों पर ऐसा ग्रहण लगा दिया कि अब न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य चिंता सताने लगी है। मुकेश के पिता रूआवसें स्वर में कहतें जब तक मां-बाप हैं तब तक तो हम इसकी देखभाल कर लेंगे लेकिन हमारे जाने के बाद कौंन इसे देखेगा।

ऐसी तस्वीरों से यह सवाल मयसर दिलों दिमाग में कौंधता है कि क्या वाकई हम गुलामी की बेड़ियों से आजाद हो गए हैं? आजादी के 70 साल में न जाने कितनी ही सरकारें बदली हो लेकिन पहाड़ का पहाड़ जैसा दर्द, यहां की गरीबी, विषमता, अभाव आज भी कम नहीं हुआ है। यहां गरीब और गरीब होता जा रहा है और अमीरों की पौबार पड़ रही है। भले ही गोरे अंग्रेजों की गुलामी से यह देश मुक्ति पा चुका हो लेकिन जुमले बाज नेताओं, सफेद कुर्ताधारियों और उसके बेरहम सिस्टम की मार से यहां की गरीब जनता तिल-तिल मर रही है। इन कुर्ताधारियों को शर्म आती है जो ऐसे इन गरीबों की वोट से सिंहासन पाकर इन्हें इनके हाल पर छोड़ती है। सफेद कुर्ताधारियों! जरा देखों इस बेबस लाचार परिवार पर, तुम्हारे पूरे सिस्टम और 70 साल की झूठे विकास की पोख खोल रहा है। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत जरा देखों यहां तुम्हारे गोल्डल स्वास्य कार्ड भी काम नहीं आ रहे हैं तुम्हारी तमाम स्वास्थ्य योजना ही इनके दर्द के सागर में डूब चुकी है।

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