क्या बिना “रणजीत” के ही “रण” जीत” पाएंगे हरीश रावत !

नैनीताल लोकसभा क्षेत्र में आजकल पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत बिना ” रण” के ही जीत करने में लगे हुए है। आजकल एक बड़ा सवाल बहुत झकझौर रहा है वो है चर्चित पूर्व विधायक रणजीत रावत एवं हरीश रावत के बीच आजकल बहुत बड़ी दूरी और शीतयुद्ध का। इस चुनाव में लोगो की आँखो के सामने दो जिगरी यारों के अक्श बार बार उभर रहें है और सभी के सवालों में चुप्पी तैर रही है । दो ऐसे लंगोटिया यार पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और उनके ख़ासमख़ास, बिज़नेस पार्टनर तथा सलाहकार रहे रणजीत रावत आजकल बहुत दूर – दूर क्यो हैं ? वह भी दिन था जब एक को जिस्म तो दूसरे को जान कहां जाता था । एक मुख्यमंत्री थे तो दूसरा सुपर चीफ मिनिस्टर की पावर से लैश रहता था । उत्तराखंड में सत्ता का केंद्रबिंदु यानि सचिवालय के चौथवे तल पर दो ध्रुवों के बीच राजनीतिक परिक्रमा करना सभी के लिए अनिवार्य था। एक की बात मानना दूसरे के लिए ख़ुदा का आदेश था ।

चर्चा है कि जब हरीश रावत की सरकार जब संकट में थी और फ्लोर टैस्ट के बुरे दौर से गुजर रही थी तब उनके हनुमान कहे जाने वाले रणजीत रावत ने ही इस परीक्षा में उन्हे पास कराने का बीड़ा उठाया था । रणजीत रावत ने यह परीक्षा तो पास करा दी, लेकिन राजनीतिक सियासत की परीक्षा में वह एक दोस्त से हमेशा के लिए बिछड़ गयें। कभी हरीश रावत का साया समझे जाने वाले रणजीत रावत की परछाई भी अब कोसो दूर हो चली है। वैसे तो रामनगर से नैनीताल लोकसभा की सीमा मिलती हुई है । लेकिन एक हनुमान के लिए यह सीमा लांघकर अपने राम रुपी भाई की सहायता करने न आना लोगों को अखर रहा हैं। आखिर क्या कारण हैं कि रणजीत रावत पौड़ी और अल्मोडा लोकसभा में तो पार्टी का प्रचार करने जा रहे है लेकिन हरीश रावत के पास संसदीय क्षेत्र नैनीताल में नहीं फ़टक रहे है ? नैनीताल से यह परहेज क्यो ? क्या दो दोस्तों में बड़ी दरार आ चुकी है ? ऐसे समय में जब हरीश रावत के चुनावों में हरिद्वार से भी कार्यकर्ता आ रहे है तो रणजीत रावत रामनगर से निकलकर नैनीताल आने से क्यों कतरा रहे है ? क्या हरीश रावत ही उन्हे नही बुला रहे है या रणजीत रावत खुद ही नही आ रहे है ?

अब रणजीत की खाली जगह को हरीश रावत के खाश भरोसेमंद “हरिपाल रावत” ने भर दिया है तथा साये की तरह वो हमेशा पहाड़ से असम तक हरीश रावत के साथ ही रहते है । हरीश रावत के मुख्यमंत्री रहते सलाहकार रहे हरिपाल रावत भी काफी माल -ताल समेटकर मालामाल हो चुके है तथा आने वाले विधान सभा चुनाव में राजनीतिक पारी खेलने की तैयारी में लगे हुए है। वैसे भी हरीश रावत के साथ गाजियाबाद, मेरठ और मुजफ्फर नगर के ठेकेदारों की टीम को भी हरिपाल रावत और संजय चौधरी ही लीड करते थे और अभी भी करते है। सुना है कि डॉ संजय चौधरी हरीश रावत के मुख्यमंत्री रहते सलाहकार के रूप में लगभग 200 करोड़ का कारोबारी सम्राज्य खड़ा कर चुके है।

कही यह ज्यादा “माल” समेटने और बहुत बड़े लेनदेन का मामला तो नहीं है ! आखिर क्यों हरीश रावत ने उत्तराखंड युवा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में रणजीत रावत के बेटे को हराने के लिए एड़ी -चोटी का जोर लगाया था । क्यों आजकल हरीश रावत के विरोध वाली लॉबी इंदिरा हृदयेश, प्रीतम सिंह सहित अन्य के साथ रणजीत रावत की गहरी दोस्ती परवान चढ़ रही है । यदि हरीश रावत इस चुनाव में हारे तो हार का ठींकरा इंदिरा हृदयेश और रणजीत रावत के सिर पर ही फूटेगा। जो भी हो इससे रणजीत रावत को हिसाब चुकता करने का मौका मिलेगा और आने वाले समय में हरीश रावत के सिंडिकेट का मुखिया बनने के रास्ता खाली मिलेगा। देखना है वक़्त क्या गुल खिलाता है ।

Category: ख़ुलासा

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